• इंडियन ब्यूरो ऑफ माइन्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ओडिशा में पाए जाने वाले लौह अयस्क का 75% हिस्सा सिर्फ क्योंझर जिले में है
  • 2001 में सिर्फ 76 खदान थीं, आज संख्या 109 हो गई हैं, राज्य के खनन क्षेत्र में मिलने वाले रोजगार में 5.31% अकेले क्योंझर जिले में

शशिभूषण

शशिभूषण

Jul 05, 2020, 02:35 PM IST

गंधलपाड़ा, ओडिशा. क्योंझर जिले को स्थानीय लोग केंदूझार कहते हैं, यानी केंदू पत्ते की झाड़ियों-जंगलों से आच्छादित जिला। इसी जिले के जोड़ा ब्लॉक की गुआली पंचायत का गंधलपाड़ा गांव और उससे सटा 181.46 हेक्टेयर का जंगल अब चंद दिनों का मेहमान है।

कोरोना से जारी लड़ाई के बीच ओडिशा सरकार ने जिन 9 ग्रीनफील्ड खनन क्षेत्रों की नीलामी की निविदा आमंत्रित की है, उनमें 314.37 मिलियन टन का यह सबसे बड़ा आयरन ओर ब्लॉक है, जहां 241.558 हेक्टयर क्षेत्र में खनन शुरू होगा।

नीलामी की कोशिश पहले भी हुई थी, लेकिन केंदूझार सिटिजन्स फोरम और अगामी ओडिशा के प्रतिरोध के बाद दिसंबर 2019 में इसे टाल दिया गया था, लेकिन अब इसे अंजाम दिया जा रहा है। गंधलपाड़ा गांव में मुंडा आदिवासियों की संख्या 350 है।

लुतुराम मुंडा, मनय मुंडा जैसे अधिकांश गांव वाले आस-पास की खदानों में कॉन्ट्रैक्ट पर कुली, ड्राइवरी, मजदूरी करते हैं। कभी इनका परिवार वनोपज पर निर्भर हुआ करता था। केजेएस अहलुवालिया माइन्स गांव के मुहाने पर है।

जुरिया मुंडा बताते हैं कि कभी वहां साल का घना जंगल हुआ करता था। आज मिट्‌टी (ओवर बर्डेन) के ऊचे-ऊंचे टिले हैं। नई खदान तो गांव में ही शुरू होनी है, गांव का बचा जंगल फिर साफ होगा। गांव से 1 किमी दूर सुंदरगढ़ जिले की सीमा है। नई नीलामी वाली सात छोटी खदानें वहीं हैं। 

नीलामी वाले सभी नौ ब्लॉक ऊंचाबली, गंधलपाडा़ (जिला-क्योंझर), पुरेईबहाल, चंडीपोशी, झुमका-पथरीपोसी, धोल्टा पहाड़, रेंगलबेड़ा, नेत्रबांधा पहाड़ और कालीमाटी (जिला-सुंदरगढ़) को मिला लें तो आने वाले दिनों में 9 वर्ग किमी में काटे जाने वाले पेड़ों की संख्या तकरीबन 9 लाख होगी। यह उन गांव वालों की गणना है, जहां नई खदानों की निविदा जुलाई माह में फाइनल होनी है। पेड़ों की सरकारी गणना अभी होनी है।

9 वर्ग किमी में काटे जाने वाले पेड़ों की संख्या 9 लाख से ज्यादा होगी।

पेड़ वही होगा, जिसकी मोटाई सीने की ऊंचाई तक 30 सेमी होगी 

बकौल डीएफओ संजय जोशी वन विभाग जंगल में उसे ही पेड़ गिनेगा, जिसकी मोटाई सीने की ऊंचाई तक 30 सेमी की होगी। उससे कम मोटाई वाले पेड़ों की गिनती बल्ली और अन्य की पौधे की श्रेणी में होगी। गांव वाले बल्ली और पेड़ का फर्क नहीं करते। 

गुआली पंचायत के पूर्व संरपंच डाबरा मुंडा कहते हैं, खनिज की नीलामी से सरकार और माइनिंग कंपनियां आबाद हो रहीं हैं। उजड़ तो हम और हमारे जंगल रहे हैं। हमें बस विकास का लॉलीपॉप दिखाया जाता है। हमारी पूंजी तो जल, जंगल और जमीन ही थी। बेइंतहां दोहन से जल स्रोत प्रदूषित हो गए।

जंगल उजड़ गया। वनोपज से चलने वाली जीविका जाती रही। जमीन किसी काम की नहीं रही। खदानों में होने वाली ब्लास्ट के कारण जंगल के जानवर सारंडा की ओर पलायन कर गए। जोड़ा-बड़बिल एरिया से रोजाना 50,000 टन मिनरल निकलता है, 5000 ट्रक चलते हैं। प्रदूषण का स्तर समझा जा सकता है।

केंदुझार सिटिजन्स फोरम के अध्यक्ष विंग कमांडर (रि.) किरण शंकर साहू बताते हैं कि साल का जंगल टाई एंड डाई प्रासेस में बनता है। यानी पेड़ उगता है, मरता है फिर उगता है। एक मुकम्मल पेड़ तैयार होने में तकरीबन 150 साल लगते हैं। ठीक से जड़ पकड़ने में ही साल के पेड़ को 30 वर्ष लगते हैं। खनन के लिए ओडिशा के किसी जिले में बीते 40 वर्षों में सबसे ज्यादा 10,451.39 हेक्टेयर वन भूमि का अंतरण हुआ है तो वह क्योंझर ही है। 

बकौल विंग कमांडर साहू यह वह रकबा है, जहां जंगल सफाचट हो चुका है। खनन कंपनियों को मिली लीज का वास्तविक रकबा 33,560 हेक्टेयर है, जिसमें 24,112 हेक्टेयर वन क्षेत्र है। यानी 240 वर्ग किमी वन क्षेत्र में से अभी आधा साफ हुआ है, आधा होना बाकी है। इससे पर्यावरण को खासा नुकसान हुआ है।

राज्य में 31% लौह अयस्क का खनन क्योंझर में ही

इस जिले की कुल आबादी का 45% विभिन्न जनजातियों और 11.62% अनुसूचित जातियों का है, जिसमें मुंडा और भुइयां सबसे ज्यादा हैं। जंगल कटने से जुआंग आदिवासियों की हालत सबसे पतली होती जा रही है, क्योंकि यह प्रिमिटिव ट्राइब वनोपज और खेती से जीविका चलाने के अलावा कुछ जानती ही नहीं।

इलाके के पर्यावरण का हाल ऐसा है कि बेइंतहां धूल उड़ती है। बारिश में लाल कीचड़ से सड़कें सन जाती हैं। क्षेत्र से गुजरने वाली वैतरणी नदी का पानी बिल्कुल नारंगी हो गया है। रोजाना ट्रकों से ढोए जाने वाले अयस्क से सड़कें बर्बाद हो गई हैं, हालांकि सडक के चौड़ीकरण व निर्माण का काम जारी है जिसकी अलग ही कहानी है। पानीकोइली से रिमुली 163 किमी (एनएच 20) और रिमुली से राजामुंडा 108 किमी (एनएच 520) का निर्माण 2005 से जारी है। अभी आधी ही सड़क बनी है।

वैसे तो ओडिशा में लौह अयस्क के पांच भौगोलिक जोन बोनई-क्योंझर, गंर्धमर्द्धन, तोमका-दैतारी, गोरुमहियासानी-बादामपहाड़ और हीरापुर हैं, लेकिन सबसे ज्यादा धनी बोनई-क्योंझर ही है। राज्य में 31.28% लौह अयस्क का खनन, क्योंझर जिले में ही होता है। 

खनन क्षेत्र में मिलने वाले रोजगार में 5% से ज्यादा क्योंझर में

इंडियन ब्यूरो ऑफ माइन्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ओडिशा में पाए जाने वाले लौह अयस्क का 75% हिस्सा सिर्फ क्योंझर जिले में है। 2001 में सिर्फ 76 खदान थीं आज संख्या 109 हो गई हैं। यह संख्या बताती है कि जंगल किस कदर उजड़ा है। राज्य के खनन क्षेत्र में मिलने वाले रोजगार में 5.31% अकेले क्योंझर जिले में है। 

रावेनशॉ विश्वविद्यालय के शोधार्थी प्रियंबदा प्रधान व डॉ सुधाकर पात्रा की स्टडी बताती है कि खनन पर निर्भर जिले के 64% लोगों की मासिक आमदनी 5-10 हजार ही है। विडंबना यह है कि खनिज संपदा के धनी इस इलाके में 62% आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। कोरोना के मरीजों के मामले में राज्य के 30 जिलों में क्योंझर का स्थान भले ही 15वां हो, लेकिन इलाके में मलेरिया, सांस का रोग, डायरिया आम बीमारी है और इसके मूल में खनन ही है।

23 साल में खत्म हो जाएगा क्योंझर का आयरन ओर डिपॉजिट
क्योंझर जिले के ‘डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन’ (डीएमएफ) के आंकलन के मुताबिक, जिले में 2,555 मिलियन टन लौह अयस्क भंडार है। 55 मिलियन टन प्रति वर्ष दोहन की गति से इसे खत्म होने में 60 साल लगेंगे। आने वाले दिनों में यहां सालाना लौह अयस्क का खनन 140 मिलियन टन होगा, यानी आयरन ओर डिपॉजिट 60 नहीं 23 वर्षों में ही समाप्त हो जाएगा।

खनन से जिले को मिलने वाली सालाना 500 करोड़ की रॉयल्टी में हिस्सेदारी से डिपॉजिट खत्म होने तक जिले को 25,000 करोड़ हासिल होने का अनुमान है। माइंस एंड मिनरल एक्ट 2015 के तहत खनन बहुल जिलों में गठित डीएमएफ में खनन कंपनियां रॉयल्टी का एक-तिहाई हिस्सा जमा करती हैं। पैसा एक ट्रस्ट के मार्फत खर्च होता है। 

क्योंझर ओडिशा का इकलौता जिला है, जहां डीएमएफ मद में बीते 5 वर्षो में 4 हजार 506 करोड़ रुपए मिले हैं। डिस्ट्रिक्ट मिनिरल फाउंडेशन ट्रस्ट का पैसा कैसे खर्च होना है इसकी गाइडलाइन प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना में दी गई है। 

जिले में तीन हजार करोड़ से ज्यादा की स्कीम को अनुमति मिल चुकी है, 1400 करोड़ खर्च हो चुका है। हाई प्रॉयोरिटी में पेयजल है, जिसकी नल से सप्लाई होनी है। लेकिन फंड से कई जगह हैण्डपंप और ट्यूबवेल लगे। ज्यादातर फेल भी हो गए। पानी में आयरन है। हाल के दिनों का डेवलपमेंट है कि डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड से गांवों में 20 फीट की ऊंचाई पर प्लास्टिक की सोलर टंकियां रख दी गई हैं।

एक ही जगह पर कई टोंटी जोड़ दी गई हैं। नियमानुसार टंकी से घरों तक नल का जल पहुंचना था, जो अभी दूर की कौड़ी है। डीएमएफ फंड से पानी की सप्लाई के लिए कुछ टैंकर भी खरीदे गए हैं जो स्थायी समाधान नहीं हैं। विंग कमांडर साहू कहते हैं कि लोगों को घर बनाने के लिए भी पैसा दिया गया जबकि प्रधानमंत्री आवास योजना से घर मिल रहा है।



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