• एक्सपर्ट्स के मुताबिक, लोगों को होता है खुद पर नियंत्रण का गलत एहसास, अपने जोखिम को दूसरों से कम समझते हैं
  • कोरोनावायरस को लेकर साफ जानकारी नहीं होना भी एक कारण, लोगों को नहीं पता कि क्या सुरक्षित है, क्या नहीं

दैनिक भास्कर

Jul 04, 2020, 03:35 AM IST

एसी शिल्टन. कोरोनावायरस से बचने के लिए दुनियाभर में लोग करीब 4 महीनों से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे हैं। हालांकि, कई जगहों पर अनलॉक के शुरू होते ही बाहर निकलने के रास्ते खुल गए हैं। ऐसे में कई इस गणित में व्यस्त हैं कि इस दौरान हमें कितना सावधान रहना है। डिकिन्सन कॉलेज में प्रोफेसर मरी हेलवेग-लार्सन के मुताबिक, यहां केवल एक दिक्कत है वो यह कि इंसान जोखिम का आकलन करने में बहुत अच्छा नहीं है। खासतौर से अपने खुद के जोखिम के मामले में। हालांकि, इंसान के मनोविज्ञान में ऐसी कई चीजें हैं, जो जोखिम की समझ को बदल सकती हैं।

खुद के प्रति ज्यादा आशावादी होना

  • डॉक्टर हेलवेग लार्सन के मुताबिक, यह सोशल साइकोलॉजी की सबसे बुनियादी चीज है, जिसमें लोगों को यह लगता है कि उनका जोखिम दूसरों से कम है। उन्होंने बताया कि इस तरह की घटनाएं दुनियाभर की कई संस्कृतियों में देखी जाती हैं। हालांकि, व्यक्तिवादी समाज (इंडीविजुअलिस्टिक सोसाइटी) में रहने वाले लोग इसका ज्यादा प्रदर्शन करते हैं।

नियंत्रण का गलत एहसास

  • डॉक्टर हेलवेग लार्सन ने कहा, “लोगों को जितना ज्यादा नियंत्रण खुद पर होता है, आमतौर पर वे उतने कम चिंतित होते हैं। इसलिए कई लोग हवाई जहाज के मुकाबले कार से जाने को ज्यादा सुरक्षित मानते हैं। जबकि, आंकड़े देखें तो कार ज्यादा खतरनाक है।”
  • नेशनल ट्रांसपोर्ट सेफ्टी बोर्ड के मुताबिक, 2018 में अमेरिका में हुए सड़क हादसों में 36,560 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। हवाई यात्रा के दौरान 381 मौत हुई थीं। ऐसे में जब मास्क लगाना और बार-बार हाथ धोना कोरोनावायरस के जोखिम को कम करने के तरीके हैं, सोशल डिस्टेंसिंग अभी भी कोविड-19 से बचने का जरूरी उपाय है।

संकेत स्पष्ट नहीं होना 

  • डॉक्टर हेलवेग लार्सन के मुताबिक, हमें कई बार खतरों के बारे में एक ही बात का पता कई जगहों से चलता है। उदाहरण के लिए हमें यह तब ही पता लग गया था, जब हम बच्चे थे कि स्मोकिंग से कैंसर होता है। हो सकता है कि हमें इसके बारे में पैरेंट्स से पता लगा हो या स्कूल से।
  • कोविड 19 के खतरों को लेकर भी कई बातें स्पष्ट नहीं हैं। इसके साथ ही कई बार स्वास्थ्य अधिकारियों और एक्सपर्ट्स में भी सुरक्षा के मामले में एक-दूसरे को लेकर असहमति देखी गई। ऐसे में हमारे पास इतने संकेत हैं और यह पता लगाने में हमें मुश्किल हो रही है कि हमें किस संकेत को मानना है।

तसल्ली

  • अगर आप यह सोच रहे हैं कि क्या दोस्तों के साथ बाहर खाना सुरक्षित है या नहीं, तो हो सकता है आप सर्च करें “क्या कोरोनावायरस के दौरान बाहर खाना खाना सुरक्षित है?”। डॉक्टर हेलवेग लार्सन बताती हैं कि इसे सर्च करने पर संभावित रूप से ऐसे आर्टिकल आएंगे, जिसमें लिखा होगा कि ऐसे वक्त में बाहर खाना क्यों सुरक्षित है।
  • हेलवेग कहती हैं, “ज्यादातर लोग एक पुख्ता सबूत तलाशते हैं।” उन्होंने बताया कि इसे “कंफर्मिंग बायस” कहा जाता है। अगर आप सच में बाहर भोजन करने को लेकर जानकारी चाहते हैं तो आपको सर्च करना चाहिए “कोरोनावायरस के दौरान बाहर जाकर खाने से क्या खतरे हो सकते हैं।”

एक्स्पोजर थैरेपी

  • हम में से कई महामारी में रहने के आदी हो रहे हैं। इससे हमारे बचाव की ताकत भी कम हो रही है। ह्यूस्टन स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के ट्रॉमा एंड रेसिलिएंस सेंटर के डायरेक्टर और मैकगवर्न मेडिकल स्कूल में साइकेट्री के प्रोफेसर रॉन एसिएर्नो के अनुसार, चिंता और घबराहट से संबंधित फोबिया के शिकार मरीजों का इलाज एक्सपोजर थैरेपी या डर का सामना करा कर किया जाता है। उन्होंने कहा, “अगर आप कुत्तों से डरते हैं और आपको पपी स्टोर में काम करना पड़े तो आप उसके आदी हो जाएंगे।”
  • कोरोनावायरस के दौर में रहना भी एक तरह की पेंडेमिक एक्स्पोजर थैरेपी है। किसी दुकान तक पहली बार जाने में आप घबरा सकते हैं, लेकिन अगर आप बीमार नहीं हुए तो दूसरी बार आप कम डर के साथ जाएंगे। इसके बाद हो सकता है आप कुछ गैरजरूरी कामों के बारे में भी सोचें।
  • मुझे यह मानना होगा कि 4 महीने पहले की तुलना में अब कम घबराहट महसूस कर रहा हूं। जबकि अब मेरे ग्रामीण इलाके में कोविड 19 संक्रमण का खतरा ज्यादा है। इसके अलावा हम एक और चीज जो सोच रहे हैं वो है आम जीवन में वापस लौटने की इच्छा।
  • डॉक्टर हेलवेग लार्सन कहती हैं कि यह जानना असामान्य नहीं है कि आप जो करने वाले हैं वो जोखिम भरा है, लेकिन आप यह भी जानते हैं कि इसके बाद जो ईनाम मिलेगा वो जोखिम से बड़ा होगा। हालांकि, वे सभी से इस बारे में दो बार सोचने की अपील करती हैं कि मिलने वाला ईनाम क्या वाकई में इतना बड़ा है। खासकर इस वक्त में।

हमारा दिमाग कभी-कभी आशावादी हो सकता है। हमेशा यह बुरा नहीं हो सकता है। इस तरह के हालात में आपका दिमाग आपको गैरजरूरी जोखिम में डाल सकता है।



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