• कंपनियों और विशेषज्ञों को त्योहारी सीजन में बिक्री बढ़ने की उम्मीद
  • वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बिक्री में गिरावट के लिए ओला और उबर जैसी कंपनियों को भी एक कारण बताया था

दैनिक भास्कर

Sep 15, 2019, 11:16 AM IST

नई दिल्ली (धर्मेन्द्र सिंह भदौरिया). देश का ऑटो सेक्टर इन दिनों माह दर माह गिरते बिक्री के आंकड़ों, बंद हो रहे शोरूम और बढ़ती बेरोजगारी के कारण चर्चा में है।  हाल ही में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बिक्री में गिरावट के लिए ओला और उबर जैसी कंपनियों को भी एक कारण माना है। इसके बाद से ही देशभर में एक बहस शुरू हो गई कि क्या वास्तव में ऑटो सेक्टर की मंदी के लिए ये कंपनियां जिम्मेदार हैं।

 

ऐसे में भास्कर ने इसकी पड़ताल की तो निकलकर आया कि वर्तमान में देश में केवल दो बड़ी एप बेस्ड टैक्सी कंपनी ओला और उबर की ही करीब 26 लाख कैब सड़कों पर दौड़ रही हैं। सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (सियाम) के मुताबिक अप्रैल-अगस्त 2019 में कुल 6.86 लाख पैसेंजर कार बिकीं जबकि बीते वर्ष की इसी अवधि के दौरान कुल 9.72 लाख पैंसेजर कारों की बिक्री हुई। यानी 29.41% या 5 माह में 2.86 लाख की बिक्री कम हुई। 

 

सियाम के डायरेक्टर जनरल विष्णु माथुर के अनुसार आटो इंडस्ट्री में गिरावट की शुरुआत पिछले वर्ष केरल में आई बाढ़ से शुरू हुई। इसके बाद से लगातार वाहनों की हर श्रेणी की बिक्री में गिरावट आई है। मारुति सुजुकी के चेयरमैन आर.सी. भार्गव कहते हैं कि उपभोक्ता और विशेष तौर पर मिलेनियल्स ओला-उबर जैसी सर्विस से ट्रैवल कर रहे हैं और कार खरीदने की योजना को आगे बढ़ा रहे हैं। इसलिए फाइनेंस मिनिस्टर का यह कहना सही है कि युवा ओला-उबर को प्राथमिकता दे रहे हैं। भार्गव की बात से एचडीएफसी बैंक के चीफ इकोनॉमिस्क अभीक बरुआ भी इत्तेफाक रखते हैं।

हालांकि बरुआ कहते हैं कि फाइनेंसिंग सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है, लेकिन इसमें अभी सुधार के प्रयास सरकार ने किए हैं। ऐसे में मुझे लगता है कि इसी साल दिसंबर या जनवरी 2020 से ऑटो सेक्टर में डिमांड में सुधार आएगा। हालांकि यह ऐसा नहीं होगा कि बीते वर्ष से बहुत अधिक वाहन बिकने लगेंगे लेकिन गिरावट का दौर रुकेगा। ओला-उबर के भारत में कारोबार के संबंध में बात करने पर कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा एवं बाजार का विश्लेषण करने वाली कंपनी कालागाटो के

 

चीफ बिजनेस ऑफिसर अमन कुमार कहते हैं कि देश में ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर खराब है, इसलिए कैब एग्रीगेटर सर्विसेज की मांग बढ़ रही हैं। वहीं मारुति के पूर्व चेयरमैन जदगीश खट्‌टर कहते हैं कि ओला-उबर जैसी कंपनियां भी एक कारण हैं लेकिन बीते छह माह से तो उनकी ग्रोथ भी नहीं हो रही है। हालांकि शहरों में ओल-उबर जैसी कंपनियों की मांग बढ़ रही है। ऑटो क्षेत्र से आ रही रिपोर्ट के मुताबिक जून 2019 की शुरुआत में कंपनियों के डीलरों के पास 35 हजार करोड़ रुपए की तकरीबन पांच लाख बिना बिकी कारें और 17 हजार करोड़ रुपए के 30 लाख बिनाबिके दुपहिया वाहन पड़े थे। एक अप्रैल 2020 से बीएस-6 मानक लागू होने से भी खरीदारों में असमंजस है।

 

भारत में वाहनों के लिए वर्तमान में पर्यावरण मानक बीएस-4 है लेकिन अंतरराष्ट्रीय मानकों को देखते हुए भारत ने 2020 से बीएस-6 मानकों को लागू करने की घोषणा पहले से की है। ऐसे में वाहन निर्माता बीएस-4 वाहनों के निर्माण को लेकर असमंजस में रहे, वहीं खरीदारों ने भी नए नियमों को देखते हुए इंतजार करना बेहतर समझा। सरकार ने अगस्त अंत में घोषणा की है कि 31 मार्च 2020 को या उसके पहले खरीदे गए बीएस-4 वाहन रजिस्ट्रेशन की पूरी अवधि तक चलेंगे।

 

लेकिन तब तक वाहनों की बिक्री को बड़ा झटका लग चुका है। ऊंची जीएसटी दर और सरकार द्वारा 20 सितंबर को जीएसटी दरों में गिरावट की संभावना के कारण भी ग्राहक अभी इंतजार की मुद्रा में हैं। सियाम के अनुसार देश में 8.3 लाख करोड़ रुपए वाले इस सेक्टर से करीब 3.2 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रोजगार मिल रहा है।

 

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क्योंं आ रही है ऑटो सेक्टर में गिरावट,पांच विशेषज्ञों से जानिए-

 

मारुति सुजुकी के चेयरमैन आर.सी. भार्गव ने बताया कि सेल्स में मौजूदा कमी के पीछे कई कारण हैं। यह वैसी ही गिरावट है, जैसी 2008, 2013 और 2018 में भी आई थी। यह गिरावट मौजूदा वित्तीय संकट की वजह से भी है। देश की कुछ बड़ी कंपनियों के खिलाफ सीबीआई केस और एनबीएफसी संकट व आईएलएंडएफएस समस्या के बाद बैंक लोन देने में ज्यादा सावधानी बरत रहे हैं। ब्याज दरें भी ज्यादा हैं।

 

सियाम के डीजी विष्णु माथुर ने बताया कि ऑटो में गिरावट की वजह मोटे तौर पर आर्थिक मंदी और उसके कारण ग्राहकोें के सेंटीमेंट्स में आई उदासीनता है। वाहन मालिकों की ऑनरशिप लागत भी लगातार बढ़ रही है। सरकार के द्वारा बड़े पैमाने पर सुरक्षा उपायों के लागू करने और उसे अनिवार्य बनाने की कीमत भी ऑटो सेक्टर को चुकानी पड़ी है। बीमा की लागत ही तीन से पांच गुना बढ़ गई है। जिससे पहले से ही संघर्षरत ग्राहक की जेब पर और भार पड़ा। 

 

एचडीएफसी बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट अभीक बरुआ ने बताया कि ऑटो सेक्टर में गिरावट के कई कारण हैं। डीलर फाइनेंस में भी समस्या हुई। विशेष तौर पर इनवेंट्री होल्डिंग में बैंक और एनबीएफसी से समस्याएं आई हैं। डीलर को इन्वेंट्री होल्डिंग में काफी फाइनेंस लगता है और उन्हें आसानी से समय पर लोन नहीं मिल पाया। अगर ऑटो क्षेत्र में गिरावट का विश्लेषण करें तो एंट्री लेवल कार में सर्वाधिक गिरावट देखी गई है। लोग एंट्री लेवल गाड़ी न खरीदकर सेकंडहैंड बड़ी कार ले रहे हैं। अर्थव्यवस्था में सुस्त बढ़ोतरी के कारण भी कर्मचारियों की तनख्वाह विशेष तौर पर निजी क्षेत्र में इंक्रीमेंट अच्छे नहीं हुए हैं। शहरों में ऑटो की मांग सेचुरेशन पर पहुंच गई है।

 

महिंद्रा एंड महिंद्रा के चीफ सेल्स एंड मार्केटिंग ऑटोमोटिव डिवीजन विजय राम नाकरा ने बताया कि ऑटो इंडस्ट्रीज में विपरीत परिस्थितियां कई कारणों का परिणाम हैं। जिसमें ग्राहकाें का मंद सेंटीमेंट, नकदी का संकट और ओनरशिप के खर्च प्रमुख हैं। हमारा विश्वास है कि हाल में केंद्र सरकार के द्वारा जो घोषणाएं की गई हैं, उससे ऑटो क्षेत्र की स्थिति में सुधार आएगा और आने वाले त्यौहारी सीजन में अच्छी डिमांड आएगी।

मारुति-सुजुकी इंडिया के पूर्व चेयरमैन जगदीश खट्‌टर ने बताया कि ऑटो क्षेत्र में तीन तरह के ग्राहक होते हैं। पहली बार खरीदने वाले, पुरानी कार के बदले नई कार खरीदने वाले और एक कार होने पर भी दूसरी कार खरीदने वाले। ग्राहकों ने अपनी खरीद को रोक रखा है इस कारण से भी ऑटो सेक्टर में मंदी आ रही है। जब तक ग्राहक खरीदने के लिए तैयार नहीं होगा हालात सुधरने की संभावना नहीं है। भले ही सरकार कितना भी प्रोत्साहन दे।
 

ओला की प्रति राइड 200 रुपए

 

  • ओला से सफर करने वाले लोगों की प्रति राइड (कैशलेस) की औसत कीमत 200 रु. होती है। उबर की यही प्रति राइड औसत कीमत 207 है। ओला से सफर करने वाले औसतन प्रति माह 2.31 बार (कैशलेस) सफर करते हैं। उबर में यह आंकड़ा 3.42 है।
  • आईएचएस मार्किट की रिपोर्ट के अनुसार एप आधारित एग्रीगेटर से जनवरी 2018 से पहले 5 वर्ष में छह लाख कैब खरीदी गईं।

 

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